गुनगुनी धुप

गुनगुनी धुप
 मुस्कान बन फैली
 सर्द रातों में महक
बन फैली
रात कि ठिठुरन
जिस्म में  फैली
चोर सन्नाटें मन
मन में बसते है
ठंडी हवाए अब
फिज़ा में फैली
धुंध कि गर्द में
नज़र आता नहीं
कुहासे सोच के
बसते है ....
सुबह कि धुप कब
नज़र में फैली
"अरु" चाहत के
नर्म नग्में बदल
गए
कैसी आवाज़ है जो
कोहरे से मन तक
फैली"
सुबह कि धुप जब
मन में फैली
मुस्कुराती बात
होटों तक फैली

आराधना राय "अरु"










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