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कविता मैं और तूम

तुम्हें बोलने कि
आदत नहीं
मैं सब कुछ बोल
 देती हूँ
अंतरमन अपना
खोल देती हूँ

तूम बंद किताब कि
तरह लगते हो
चाहूँ भी पढ़ ना पाऊँ

ऐसे लगते हो
तुम्हारे मूक बोलों को
समझ नहीं पाती हूँ

मन कि तुम्हारी थाह
ना पा कितना पछताती हूँ
मैं बातें कह कर भी
संवेदन हीन हो जाती हूँ
तुम्हारे अस्तल में
समुन्दर पाती हूँ

तुम्हारी आँखों से जब
भाव गहराते है
मैं जल कि मीन
 हो जाती हूँ
तूम बिना कहे सब
कुछ जान लेते हो
मैं नीर बहा कर
भी समझ कहाँ पाती हूँ

मैं पल में रूठ कर
 मान जाती हूँ
तुम रूठे तो फिर
कहां मान पाते हो
क्षमा  को सिर्फ
किताबों में पाया था
तुम्हे देखा तो
 किताबें झूठी लगी
दया , क्षमा ,प्रेम
 सहनशीलता का
तूम से सच्चा अर्थ जाना था


आराधना राय अरु

क्या कहिये नज़्म

प्यार ,इश्क, लगावत का क्या कहिये
डूब कर दरिया पार जाने का क्या कहिए

उसने निभाया ही नहीं ज़माने का चलन
उसकी रहगुज़र से गुजरने का क्या कहिए

चाँद तारों का सफर मैंने किया ना कभी
उसके बामों दर कि सहर का क्या कहिए

प्यार फसाना था उसने निभाया ही नहीं
इश्क़ के ऐसे  कारोबार का क्या कहिए

आराधना राय अरु


माँ

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साभार गुगल
सुख में सब साथ रहे है
दुख  तूने पहचाना है
माँ तेरी बातों को मैंने
माँ बन कर ही जाना है

नाप तोल के बोल रहे है
 सूना मन क्या जाना है
बोली प्रेम कि बोली उसने
करना प्रेम को ही जाना है


सारे संबंधो के ताने बाने है
तुझ   से मिलकर  जाने है
माँ तेरे आँचल में छिप कर
लगाती दुनियाँ दीवानी है

माँ तुझ को छोड़ कर कोई
जिंदगी के ना कोई माने है
तू रूठी तो मेरा मन ना लगे
तुझ से जुडे कितने फसाने है



आराधना राय "अरु"




मीत ---- गीत

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साभार गुगल

बसे हो मेरी सांसो में तूम
धड़कन में छा जाते हो

बसे हो मेरी................................

तुम अपनी साँसों से
हर पल ही महकाते हो

बसे हो मेरी................................


लो बनकर जीती हूँ अबतक
तूम संग मेरे जल जाते हो

बसे हो मेरी................................

देख ली इस दिल की बैचेनी
मर कर इश्क़ को पाते हो

बसे हो मेरी................................

पास रहो या दूर रहो तुम
तुम मुझ में रह जाते हो

बसे हो मेरी................................

सपना बन कर आने वाले
आँसू बन क्यों आते हो

बसे हो मेरी.......

सुख दुःख के साथी हो मेरे
मीत मेरे अनुरागी हो

बसे हो मेरी.......