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नज्म बरसात

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अब के सावन में बरसात ना होगी
इतना रोये है हम अब कोई बात ना होगी
दिल जला कर क्या पा लिया तुझे
अब के सपनों में भी वो रात ना होगी
मरहले और भी है इक तेरी राहों के सिवा
आरजू दिल में रहेगी मुलाकात ना होगी
आए मुझे देखने कितने परवानो की तरह
रश्क ए चमन में मगर वो बात ना होगी
-----------अरु

नज़्म इंतज़ार

इंतजार इक सदी सा लम्बा लगता है
कभी बीती बातों का आईना लगता है

देख लेती सूरत भी तेरी आईने में उस
दुनिया के कहर से  डर बड़ा लगता है

लौट आते है पल सारे वो सुहाने मेरे
तेरे साथ सुख और दुख में गुज़ारे मैंने

एक लम्हा सदी का इंतज़ार सही
तेरे मिलने ना मिलने जा इंतजार सही

नज्म ------------ अरु

गीत

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बंद कागज़ पे लिखे है
                                कुछ गीत तेरे

                                उँगलियों ने छुई  है प्रीत
                                 बस प्रीत तेरी

                                  लिख दिए है सभी ज़ज्बात
                                 सुहाने  से

                                  धुप में जैसे इक  शजर है
                                  साया बन के

                                 बंद कागज़ --------------------


                                 तू ना आए तो शाम हंसी
                                 रुक जाए
                                 महकी महकी सी कोई साँस
                                 कही रुक जाए


                                 बात करती है तेरी बात
                                 रातों में
                                 आईना करता है तकरार
                                  मेरा रातों में

                                बंद कागज़ ------------------


                                लिख गया कोई दिल की बात
                       …

अश्रु

कही आँख से निकला होगा
कही अविरल बहता होगा
दुख में सुख में अश्रुपूर्ण सी धारा

कही कभी कुछ कहता होगा
अश्रु बिंदु तुम्हारा
नयनो में भर आता है
अश्रु दीप बन सा हारा

जी कर मरने तक का प्रण
लेता कभी किसी हंसी के पीछे
लहराता मधुरिम सा सहारा

आज सुखों को देख है हँसता
कभी दुख का राग सुनाता
बहता अश्रु सा तारा

आराधना राय

आराधना राय

नज़्म डर

गुलो - गुलज़ार की बातो से डर लगता है
अब तो तेरे आने से भी डर लगता है

वो जो रोनके बढ़ा रहे थे महफ़िल की
उनकी रुसवाइयों से भी डर लगता है

शाम थी शमा थी मय औ मीना भी
बस उसे लब से लगाने से डर लगता है

शज़र जो मेरे सर पर कल सरे शब रहा
उस के कट जाने का भी डर लगता है

आराधना राय

रोज़

रोज़ लगते है मेले मेरे दर पर  तेरी यादों के रोज़ अपने हाथो से कोई  तस्वीर पोछ देती हूँ
रोज़ बता कर अश्क आखों से लुढकते है रोज़ सुबह मेरी पेशानी  पर महसूस करती हूँ
रोज़ तूम को देख कर अनजान बनती हूँ रोज़ थोडा थोडा तूम पे रोज़ मरती हूँ
तेरी यादे है तूम भी हो फिर भी तुम्हारे बिन यूँ ही जीती हूँ

अतुकांत कविता

तुमने लिख कर जो छोड़े है
शब्द आस पास मेरे कही
वो मेरी दिल की भट्टी में
तप गए  के सुनहरे रंग में
बिखर रहा था जो वजूद
 उस से नाता जोड़ बैठी हूँ
शब्दों से रिश्ता अपना
टूटते दिल को थामने की
हिम्मत  शब्दों ने  दी है
कब से बैठी हूँ कुछ तूम
फिर बोलो जानती हूँ
नहीं बोल पाओगे तूम
तुम्हारी शक्सियत में
दिल में लिए बैठी हूँ
चन्द शब्दों को नहीं
पूरी ज़िन्दगी संभाल
बैठी हूँ
आराधना राय अरु