1994 मेँ हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत , मेरी सहेली नामक मैगज़ीन मे कहानियाँ लिखी नाटक और कुछ रेडिओ प

Tuesday, December 27, 2016

अश्रु




कही आँख से निकला होगा
कही अविरल बहता होगा
दुख में सुख में अश्रुपूर्ण सी धारा

कही कभी कुछ कहता होगा
अश्रु बिंदु तुम्हारा
नयनो में भर आता है
अश्रु दीप बन सा हारा

जी कर मरने तक का प्रण
लेता कभी किसी हंसी के पीछे
लहराता मधुरिम सा सहारा

आज सुखों को देख है हँसता
कभी दुख का राग सुनाता
बहता अश्रु सा तारा

आराधना राय

आराधना राय  

Sunday, October 23, 2016

नज़्म डर

गुलो - गुलज़ार की बातो से डर लगता है
अब तो तेरे आने से भी डर लगता है

वो जो रोनके बढ़ा रहे थे महफ़िल की
उनकी रुसवाइयों से भी डर लगता है

शाम थी शमा थी मय औ मीना भी
बस उसे लब से लगाने से डर लगता है

शज़र जो मेरे सर पर कल सरे शब रहा
उस के कट जाने का भी डर लगता है

आराधना राय

Thursday, October 20, 2016

रोज़

रोज़ लगते है मेले मेरे दर पर 
तेरी यादों के
रोज़ अपने हाथो से कोई 
तस्वीर पोछ देती हूँ

रोज़ बता कर अश्क
आखों से लुढकते है
रोज़ सुबह मेरी पेशानी 
पर महसूस करती हूँ

रोज़ तूम को देख कर
अनजान बनती हूँ
रोज़ थोडा थोडा तूम पे
रोज़ मरती हूँ

तेरी यादे है तूम भी हो
फिर भी तुम्हारे बिन
यूँ ही जीती हूँ


Thursday, October 6, 2016

अतुकांत कविता

तुमने लिख कर जो छोड़े है
शब्द आस पास मेरे कही
वो मेरी दिल की भट्टी में
तप गए  के सुनहरे रंग में
बिखर रहा था जो वजूद
 उस से नाता जोड़ बैठी हूँ
शब्दों से रिश्ता अपना
टूटते दिल को थामने की
हिम्मत  शब्दों ने  दी है
कब से बैठी हूँ कुछ तूम
फिर बोलो जानती हूँ
नहीं बोल पाओगे तूम
तुम्हारी शक्सियत में
दिल में लिए बैठी हूँ
चन्द शब्दों को नहीं
पूरी ज़िन्दगी संभाल
बैठी हूँ
आराधना राय अरु




Thursday, September 29, 2016

अच्छा होता


क्वार कार्तिक की
धुप में तपने से
अच्छा होता
जेठ की दुपहरी
सह लेते
वकावाली खाने
से अच्छा
नीम कसली
खा लेते
मृत्यु की ठंडक
सहने से
बेहतर
जीवन की
गर्मी सह
लेते

सघन वृक्ष
की छांव में
गुम हो रहने
से
धुप- छांव
सह लेते

आराधना राय

Tuesday, September 27, 2016

घर

मेरे घर के आँगन में वो
अपना घर बसती है
कभी दाना , कभी कतरन
वो खूब चुराती है
चार दानो से खुश
हो जाती है
धड़कने दिल की
वो बढाती है
एक गिलहरी
का घर है
पेड़ के कोटर में
अपने बच्चो को
बड़ा कर फिर
छोड़ देगी वो

कल जो उसका था
आज भी उसका
कोटर होगा वो

मुझे देख ना जाने
क्या कह जाती है वो

उसकी बाते में समझ
नहीं पाती हूँ

आराधना राय

दुनियाँ कविता अतुकांत



Image result for इमेज अर्थ
साभार गुगल



छांव - धुप सी है ये दुनियाँ
क्या प्रेम प्रीत सी बंधी दुनियाँ
चाहे स्वीकार करो ना करो

अपने - अपने ध्रुवों पे अडिग
गोल - गोल धूमती है दुनियाँ
बोलो दो चाहे चुप तूम रहो 

अपनी - नियति से  बंधे
 सच - झूठ के बोल बोलते
खानों और अलग खांचो में
समय के बोल बोलती है दुनियाँ