प्यार ,इश्क, लगावत का क्या कहिये डूब कर दरिया पार जाने का क्या कहिए उसने निभाया ही नहीं ज़माने का चलन उसकी रहगुज़र से गुजरने का क्या कहिए चाँद तारों का सफर मैंने किया ना कभी उसके बामों दर कि सहर का क्या कहिए प्यार फसाना था उसने निभाया ही नहीं इश्क़ के ऐसे कारोबार का क्या कहिए आराधना राय अरु
अबके सावन हमको बहुत रुलाएगा बात - बात में तेरी याद दिलाएगा बारिश में जब भीगे भीगे फिरते थे वो बचपन लौट के फिर ना आएगा मन बेचैनी से तुमको फिर ढूंढेगा बांह पकड़ के हमको कौन सिखाएगा बाबा पापा सब नामकरण संक्षिप्त हुए अब रहा नहीं कोई जो हमें हंसाएगा सपन -सलोने सारे सब खत्म हुए खाली रातों में लोरी कौन सुनाएगा अपने पिताजी को समर्पित आज मेरे पिताजी की बरसी पर
साभार गुगल ------------------------------------------- चाँद को देख जाने क्यों मुस्कुराती हो हवाओं का मंद मंद सा राग सुनाती हो जैसे देखा हो पहली- पहली बार तुम्हें अनजान बन सामने मेरे आ जाती हो तुम्हे इंतज़ार है मेरा कितनी सदियों से एक अनबूझी पहेली बन सामने आती हो नजर मिला , कभी झुका कहीं बातें तुमने सुबुगाहट लिए मन में चुपचाप रह जाती हो शबनम पीरों आँखों में किस बात का अहसास कराती हो शीतल छांव सा चंवर डुला मन सहला जाती हो धुप की तपिश में सुलगता हुआ तेरा चेहरा लगा ओंस से भीगी बातों से मन के घाव भर जाती हो मेधवर्णी श्यामल तृप्त भाव से देख किस को समझाती हो रात के डोले में बैठ बीते दिन याद कराती हो तूम कुछ और नहीं स्वपन हो क्यों हँस कर मुझे तूम बताती हो आराधना राय ''अरु''
हसीन थी के तेरी जुल्फों में उलझी थी जब तलक
ReplyDeleteअब चुभ रही है बूंदें जो मेरा आशियाना बहा गई!