समय

एक वृत में सभी को समेटे
दाए से बाए पेंडुलम हिलाते
समय अपने मोल को जता के
चौबीस कोणों में विभाजित कर
सब को चुपचाप बाँध  ढो रहा है
पल - पल में अपनी अहमियत जता
नाद से सुर  बना के कहता है
आदमी तू आदमी के साथ
कैसे  अभी तक जिंदा है
मशीन है सभी सुबह से शाम
काम करते  है
कहते है मन तेरा अभी तक परिंदा है
ईष्या द्वेश में हारी सब कि जिंदगिया
दुसरे के दुख से सब ही आहत है
शिकायतों का बाज़ार समेटे सब
अपनी अपनी मन कि गाँठ को
सम्हाल कर बैठे है
आदमी समझता रहे खुद को खुदा
हर शय को समय ने बाँध समय
हुआ  "अरु"सब से ही बड़ा
आराधना राय "अरु"

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