डाली
हरी डाल सावन में गीत गाती थी आसंमा को देख मुस्कुराती थी झूम उठती थी हवा के हिलोर से मस्त हो सब को भाती थी धुप में बाहें फैला तकती थी आकाश सुमधुर सपने नभ को सुनती थी। मन की धरत...
लेखिका की रचनाये भारतीय कॉपीराइट एक्ट के तहत सुरक्षित है अंत रचनओं के साथ छेड़खानी दंडनीय अपराध माना जाएगा