नव -गीत

पतझड़
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नई कोपलों के आने से पहले
पीले पत्ते झड जाते है......
दूर शाख से होते- होते
हँस कर बात  सुनाते है.......
शाश्वत रहा ना जग में कोई
यौवन के दिन ढल जाते है .........
कोमल कोपल लहरा  कर बोली
जीवन का राग़ सुनाते है ....
पीले हो कर भी स्वर्णिम
 आभा बिखराते है............. .......
दे जाते पीछे एक धरोहर
जिन पे नव कोपल इतराते है
चाल चले समय कि धारा
जिसमें नव कोपल कुम्हलाते है
पीले पत्ते हो टूटे शाख से
क्या कम वेदना दे जाते है....................
कोंपल जब मुरझाया होगा
तरु ने अंत अपना पाया होगा
पीले पात झर आगमन नव दे जाते है
पर उनका क्या जो जीवन
जीने से पहले मर जाते है...............................
पतझड़ में पत्ते पीले पड़ जाते है
कोंपल मुरझा कर अंत समझाते है
आना और जाना कर्म हुआ
दुःख  से सुख भी भंग हुआ
कर्तव्य का बोध कराते है
हँस कर जो जीवन दे जाते है

आराधना राय "अरु"




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