तिरंगा




पिछले साल यकायक वो मिल गया
अचंभित हो उसे  झुक कर उठा लिया
फटे हाल था फिर भी मुस्कुरा रहा था
अपना नाम भी तिरंगा बतला रहा था
मैंने पूछा क्या मिला तुझे ए यू  तिरंगे
बेमतलब पैरों तले मसला  ही तू गया
अमेरिकन या ब्रिटिश में रह गया होता 
मध्य वर्गीय लोगों सा नहीं पीटा होता
 बैक से ऋण ले अपने आप को रो रहे है
ना जानें कितने राष्टीय उत्पादों होने के
भ्रम को रोज़ जी कर मौन से अब हो रहें  है 
उपलब्धियाँ बेमानी सी पढ़ कर ही खुश हो
नई मुसीबतों में अपना ही सर दे ही रहे है
मुद्रा स्फीति दर बढ़े या फिर वो कहीं घटे
हम महॅंगाइयों में ना जानें कैसे रह रहे है 
जानते नहीं बस होड़ का झुनझुना  दे कर
अपनी संतानों को यूँ बेदम क्यों कर रहे है
अब तो पता नहीं कि रो रहे है या हँस रहे है
तिरंगा हँसा और बोला कहानी में दम नहीं है
जहाँगीर ने यहीं सोच कर अँग्रेज़ों को बुलाया था
दो सौ साल से ज़्यादा घर अपना ही लुटवाया था
अपना घर , अपना होता है उसे ठीक भी करना है 
अपनी नौका में छेद हो तो स्वयं भरना ही होता है
कह कर अचानक तिरंगा मेरे हाथ से उड़ गया था
मुझे मेरे भारतीय होने के अहसास से भर गया था
मंदिर , न मस्जिद कि वो बात बस ज़मीर , ज़मीं की
अंतरात्मा जगा विदा हो मुझ से कहीं सीमा पे चला गया
आराधना राय "अरु "
पुनश्च    --   नई कविता , छंद मुक्त।


Comments

Popular posts from this blog

अतुकांत कविता

अश्रु

बता तूने क्या पाया मन