चिट्ठियाँ नाराज़ थी



साभार गुगल


चिट्ठियाँ नाराज़ थी
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चिट्ठियाँ नाराज़ थी बाँचने वाला कोई ना था
हाल अपना कह कर सुनाने वाला कोई ना था
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गाँव कि दहलीज़ क्यों रो कर हो गई पराई
मन का आँगन सूना पड़ा बेचैन हो गई तन्हाई
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मेरे देश में अब कोई प्यार का आँचल ना था
मंदिर, मस्जिदों की तकरार में हो गई पीड पराई
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देश अनाथों की तरह हिस्सों में कहीं बँट गया
शहरों को आइना दिखलाता गाँव मेरा सो गया
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ठंडी ब्यार उन्हें क्या छूती जिनका दिल मर गया
यवनिका चेहरों से हट गई आँखों में वो सावन ना था
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मूक हो चुके बोल है "अरु" आवाज़ देने वाला कोई ना था
मेरे घर के आगंन में आसमान कोई तुझ सा ना था
आराधना राय "अरु "



Comments

  1. यवनिका चेहरों से हट गई आँखों में अब वो सावन ना था
    मूक हो चुके बोल है "अरु" आवाज़ देने वाला कोई ना था

    मर्मस्पर्शी ....बहुत गहरी पंक्तियाँ

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