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बात कहता था

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साभार गूगल वो सादा दिल था बात कहता था ख़ामोशी के साथ राज़ कहता था अपने आप से जुदा रहता था  मगर दिल का हाल कहता था लिबास उम्र भर सादा रहा उसका हँस कर पते कि बात कहता था उसको नहीं था वक्त का अंदाज़ वो सच्ची बात मुँह पर कहता था मलाल था नहीं दिल में उसे कोई अपनी रेखाओं में देखता रहता था छुप कर नहीं सरेआम कहता था खयाली नहीं वो यथार्थ कहता था ईश्वर तूम खो गए होगे कही उससे तुम्हे ही खोजता दिन रात रहता था करूँ क्या बात उसकी वो मसीहा था "अरु" सखा सा पिता दुख में जिया था

जिया

मुक्तक-------       शेष रही अभिलाषा का विस्तार किया जीवन  जिए बिना ही स्वीकार किया आस जोड़ जीने वाले को ही मान दिया जाने पहचाने बिना कैसा श्रृंगार किया  भग्न रही संवेदनाओं को अंगीकार किया  सावन ने पतझड़ जैसा ही व्यव्हार किया  आसूँ पी कर जीने वाले किसका दर्द जिया  मोल - भाव कर जीवन को निस्सार किया  जलज नैनों से बरसा किसका उद्धार किया  किस पथ पर चल कर भव् सागर पार किया  मित्र भाव से छला गया हर्षित क्या हृदय हुआ  बाधित करते कर्म उनको क्यों स्वीकार किया आराधना राय "अरु"

घर

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साभार गुगल सूना घर अक्सर मेरा बहुत शोर मचाता है लौट के आती है खुशिया जब भी मन मुस्काता है आम, पलाश सब हरे हो गए धरती-अम्बर भी परे हो गए मुझे रोज़ रुला जाती है भीनी महक घर आँगन की दुनियाँ के जंजाल में थक कर सो - गए अजब ही मेले में घर दूर छिप कर मिलता कही अकेले में फिर भी उलझी नित नए झमेले में घर आखिर घर ही होता है अपने कोटर में छिप कर हर कोई सोता है रोता है अपने मन के घर आँगन में आराधना राय "अरु"

गुनगुनी धुप

गुनगुनी धुप  मुस्कान बन फैली  सर्द रातों में महक बन फैली रात कि ठिठुरन जिस्म में  फैली चोर सन्नाटें मन मन में बसते है ठंडी हवाए अब फिज़ा में फैली धुंध कि गर्द में नज़र आता नहीं कुहासे सोच के बसते है .... सुबह कि धुप कब नज़र में फैली "अरु" चाहत के नर्म नग्में बदल गए कैसी आवाज़ है जो कोहरे से मन तक फैली" सुबह कि धुप जब मन में फैली मुस्कुराती बात होटों तक फैली आराधना राय "अरु"

तूफान

शोर ऊँचा सुनाई देता है जब भी बढ़ जाता है झूठ  का तूफान सच रह जाता है अकेला कही मौन हो , तूफानों में अडिग खड़ा हो जाता है है सहज हार जाए तूफानों से सच शक्ति है  वो नहीं घबराता है पांच पांडव थे दुर्योधन असंख्य था महाभारत  जीतना दुष्कर जीवन- मरण के पार उठ कर पताका विजय कि पांडवों ने फहराई थी कृष्ण कि गीता अटल सत्य है केवल-- कर्म ही धर्म है बात केवल कृष्ण ने बताई थी हार जाते है सौ झूठ दुर्योधन के एक सत्य ही कर्म बन साथ आता है---- गीता का पाठ हर कोई कहाँ जीवन में उतार पाता है सच अकेला कभी जब क्रोस पर लटकाया जाता है -- कभी सुकरात ईशु बन धरती पर स्वर्ग लाता है यही है इतिहास जो अपने को बार बार दोहराता है आराधना राय "अरु"

तुझ से मिले ------अतुकांत---- -----------------------------

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साभार गुगल ----------------------------- सुबह से शाम ज़िन्दगी के ताने-बाने बुने रेशम से महीन धागे से रिश्तों के पैबंद सिले जार- जार रो कर तुझ से मिले डूब कर देखा कभी सहरा भी गिला लगे इस तरह रोज़ हम तुझ से मिले समंदर में उस तरह से हम हर एक दरिया से मिले... ज़िन्दगी बता हम तुझ से क्यों मिले मेरी बदहवासी देखी तूने..... रोती आवाज़े भी सुनी तूने बेबस है इसलिए हम तुझ से मिले.... जीने के लिए मर कर क्या तुझ से मिले.. अरु बहुत अभी अश्क पीने को....प्यासा गर दरिया है दरिया क्यों रहे... आराधना राय" अरु"

सच जीवन का

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साभार गुगल सच जीवन का ---------------------------------------- सोच कर यही पाया ज़िन्दगी  तेरे हाथ क्या आया उम्र भर खोजते है जिसको हम बता हाथ कि खाली लकीरों के सिवा क्या पाया एक पल कही खुशियाँ भी खिलौना है और कहीं गमगीन मातम पाया जिंदगी सोच तूने क्या पाया जुल्म करना जिनकी हो फ़ितरत रो कर उन के सामने क्या पाया आराधना राय "अरु"