दुख में कितना सुख



चिलचिलाती धूप जब  खूब शोर मचा आती है
तपती- हुई धरती  सूनी हो बंजर सी हो जाती है
चूम - चूम कर  रो कर बिछड गए जो शाखों से
पात- पात पे शोर मचा मुझे बतला कर जाती है

पुरवैया  दुःख में कितना सुख दे कर तू जाती है
मन के कोनों को शांत भाव से भर कर जाती है
धरती को साया देने वाले शोक ताप  हरने वाले
तुझे कानों में कोई मधुर गीत सुना कर  जाती है

जल कि प्यास  कितना  मन को तरसा जाती  है
प्यास पंछी की बुझ कर अनबुझी सी रह जाती है
अदिति रूठ कर अंत-सलिला सा हाल बताती रही
 दुख में अपनी आवाज़ अब किस से छुपा  जाती है
मानो दुख से दुखी विधाता अग्नि प्रखर बरसता है

धरणी के दुख से जैसे ईश्वर तुम्हारा  कोई नाता है
तृषित , शुधित जन - क्रंदन का देव मात्र ही दाता है
पंछी के  गान सृष्टि तुझ को सब ही अर्पित हो चले
अम्बर धरती के लिए कितने अश्रुधार बहा  जाता है

दुख में अपना सा साथ ही सुख कितना दे कर जाता है
हवा का चलना तेरा मुस्कुराना याद करा कर जाता है
आधात हदय को तोड़ कर आँखों की बरसात से भीगा
नीर दुख में सुख का बहाना बना कर कभी आ जाता है

आराधना राय "अरु"


Comments

  1. bahut sunder rachana hai aradhana ji , such aur dukh ek doosere ke poorak hote ek ke abhaav mei doosere ka vaastavik aanand nahi prapt hota hai.

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