ज़ख़्म दिल

 zakham dil ka mukkder ho gaye hai
kare kya hum kahi pe kho gaye hai
bharm na zane kis ko ho gaya hai
an dariya bhi samunder ho gaye hai
main sehra main rahe ya gulsita main
dil akela tha mera akela rah gaya hai
daag dil pe liye phirte rahe umer bher
suna hai aaj unke thikane algho gaye hai
unhe apna maan kr apna k ah diya hoga
khta meri thi "aru" sab ab bevajah ho gaya hai
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ज़ख़्म दिल के मुक्क़दर हो गए है
करें क्या हम कहीं पे खो गए  है
गैर के हम क्यों गए है
दरिया भी समंदर हो गए है
वो सहारा में रहे या गुलिस्तानों में
दिल अकेला था अकेला रह गया है
दाग दिल पे लिए फ़िरते क्यों है
आज हम भी दीवाने हो गए है
जिन्हें  अपना कहा  वो तो नहीं है
खता मेरी थी "अरु" वावफा हो गए है 

अगर मेरी बात ने आप को चोट पहुंचाई हो तो माफ़ करे।
शुक्रिया।

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