परिभाषाएँ

मन की जाने कितनी परिभाषाएँ
पढ़ डाली मैंने ,
मन की सारी इक्च्छाओं की तस्वीर
बदल दी मैंने
बस्ती -बस्ती चलने वाले पर्वत पर 
जा ठहरे
भूली हुई आशाओं की फिर झड़ी लगा
दी मैंने
सावन बरसे , महुआ महके या भादो
क्वार सा दहके
इस जीवन की जाने कितनी ही सब
रीत बदल दी मैंने
मन के लिए चली , महकी और युँ
तकदीर बदल दी मैंने
आराधना राय "अरु "

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