Posts

गीत

Image
                               बंद कागज़ पे लिखे है                                 कुछ गीत तेरे                                                                     उँगलियों ने छुई  है प्रीत                                  बस प्रीत तेरी                                   लिख दिए है सभी ज़ज्बात                                  सुहाने  से                ...

अश्रु

कही आँख से निकला होगा कही अविरल बहता होगा दुख में सुख में अश्रुपूर्ण सी धारा कही कभी कुछ कहता होगा अश्रु बिंदु तुम्हारा नयनो में भर आता है अश्रु दीप बन सा हारा जी कर मरने तक का प्रण लेता कभी किसी हंसी के पीछे लहराता मधुरिम सा सहारा आज सुखों को देख है हँसता कभी दुख का राग सुनाता बहता अश्रु सा तारा आराधना राय आराधना राय  

नज़्म डर

गुलो - गुलज़ार की बातो से डर लगता है अब तो तेरे आने से भी डर लगता है वो जो रोनके बढ़ा रहे थे महफ़िल की उनकी रुसवाइयों से भी डर लगता है शाम थी शमा थी मय औ मीना भी बस उसे लब से लगाने से डर लगता है शज़र जो मेरे सर पर कल सरे शब रहा उस के कट जाने का भी डर लगता है आराधना राय

रोज़

रोज़ लगते है मेले मेरे दर पर  तेरी यादों के रोज़ अपने हाथो से कोई  तस्वीर पोछ देती हूँ रोज़ बता कर अश्क आखों से लुढकते है रोज़ सुबह मेरी पेशानी  पर महसूस करती हूँ रोज़ तूम को देख कर अनजान बनती हूँ रोज़ थोडा थोडा तूम पे रोज़ मरती हूँ तेरी यादे है तूम भी हो फिर भी तुम्हारे बिन यूँ ही जीती हूँ

अतुकांत कविता

तुमने लिख कर जो छोड़े है शब्द आस पास मेरे कही वो मेरी दिल की भट्टी में तप गए  के सुनहरे रंग में बिखर रहा था जो वजूद  उस से नाता जोड़ बैठी हूँ शब्दों से रिश्ता अपना टूटते दिल को थामने की हिम्मत  शब्दों ने  दी है कब से बैठी हूँ कुछ तूम फिर बोलो जानती हूँ नहीं बोल पाओगे तूम तुम्हारी शक्सियत में दिल में लिए बैठी हूँ चन्द शब्दों को नहीं पूरी ज़िन्दगी संभाल बैठी हूँ आराधना राय अरु

अच्छा होता

क्वार कार्तिक की धुप में तपने से अच्छा होता जेठ की दुपहरी सह लेते वकावाली खाने से अच्छा नीम कसली खा लेते मृत्यु की ठंडक सहने से बेहतर जीवन की गर्मी सह लेते सघन वृक्ष की छांव में गुम हो रहने से धुप- छांव सह लेते आराधना राय

घर

मेरे घर के आँगन में वो अपना घर बसती है कभी दाना , कभी कतरन वो खूब चुराती है चार दानो से खुश हो जाती है धड़कने दिल की वो बढाती है एक गिलहरी का घर है पेड़ के कोटर में अपने बच्चो को बड़ा कर फिर छोड़ देगी वो कल जो उसका था आज भी उसका कोटर होगा वो मुझे देख ना जाने क्या कह जाती है वो उसकी बाते में समझ नहीं पाती हूँ आराधना राय